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Saturday, July 23, 2016

Shole hi shole bhadke hai ab barfile ghati me

शोले ही शोले भड़के है,अब बर्फीली घाटी में
देशद्रोह की खाद मिली है,काश्मीर की माटी में।
केसर के खेतो में देखो,विषबेलो का राज हुआ
विस्फोटो की गूँज बढ़ी है,लुप्त प्रेम का साज हुआ।
सिंहो की धरती है सहमी,चंद सियारी नारो से
खंड खंड भी ताज हुआ है,शैतानो के वारो से।
मस्तक पे दस्तक है दे दी,देशद्रोह की रोली ने
माँ को छलनी कर डाला है,खुद बेटो की गोली ने।
जिस दानव ने हिंसा भर दी,काश्मीर के पूतो में
उसका ही तो नाश किया था,सेना की बन्दूको ने।
जिसका नाम मिटा देने पर,वीर खूब हर्षाए थे
घाटी में अब चैन बढ़ेगा,सोच सोच मुस्काए थे।
उसकी मृत्यु पर कुछ द्रोही,रोने गाने बैठे है
नीच सियासत वाले भी,वोटो की खातिर ऐंठे है।
चंद कलम के गद्दारों ने,इतना शोर मचाया है
छाती ऐसे पीटी जैसे,बेटा मार गिराया है।
विषधर के फन कुचले जाए,समय निकट वो आया है
देशद्रोह के नग्ननाच ने,शर्मिंदा करवाया है।
छोडो भी ये मीठी बोली, विष को विष से मारो अब
अमरनाथ शीतलता त्यागो,रूप विनाशक धारो अब।
वीर कह रहा माँ चंडी पर,खुल कर रक्त चढाओ जी
पत्थरबाजो के सीने में,अब संगीन गढ़ाओ जी।
क्रोध भी इतना भीषण हो कि,सब बुरहान पिघल जाए
पत्थर तो क्या फूल फेंकने,में भी प्राण निकल जाए।
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